मारवाडी की आस्था का प्रमुख केंद्र: 500 वर्ष पुराना स्वयंभू रातानाडा गणेश मंदिर का गौरवशाली इतिहास
जोधपुर, डेस्क रिपोर्ट:
राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में अपनी गहरी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान रखने वाला जोधपुर का रातानाडा गणेश मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि लाखों मंदिरों की अखंड आस्था का जीवंत केंद्र है। जोधपुर शहर से करीब 5 किमी दूर पहाड़ी पर स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर अपने 35 साल पुराने अवशेष और चमत्कारी अवशेषों के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। आइए जानते हैं इस पावन धाम का पूरा इतिहास और इससे जुड़ी खास बातें।
📌 भगवान से स्वयं प्रकट हुए थे विघ्नहर्ता गजानन
स्थानीय इतिहास और धार्मिक धर्मशास्त्रों के अनुसार, मंदिर के गर्भगृह में स्थापित भगवान गणेश की भव्य मूर्ति मानव निर्मित नहीं है। करीब 500 साल पहले रातानाडा की प्राकृतिक चट्टानों को चिरकर यह मूर्ति स्वतः ही प्रकट हुई थी, जिसे ‘स्वयंभू प्रतिमा’ कहा जाता है। लोककथाओं में इस स्थान को महर्षि विश्वामित्र की प्राचीन तपस्थली भी माना जाता है, जहां उनकी कठोर मूर्तियों से बप्पा प्रकट हुए थे।
करीब 8 फीट की ऊंचाई और 5 फीट की इस मूर्ति के दोनों तरफ उनकी पटनियां रिद्धि और सिद्धि भी हैं। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, विक्रम संवत 1857 में मारिजुआन के सहयोग से इस पहाड़ी पर एक छोटा मंदिर बनाया गया था, जिसका वर्ष 1964 में आधुनिक और भव्य जीर्णोद्धार किया गया था।
राजा उनकी वीरता से अत्यधिक प्रभावित थे और उन्हें माउथमांगा पुरस्कार देना चाहते थे। हालाँकि, उस निस्पृह ब्राह्मण ने कोई निजी संपत्ति लेने से मना कर दिया। तब राजा ने रातानाडा पहाड़ी के आसपास की भूमि में उन्हें उपहार दिए और उनके परिवार को इस नवनिर्मित गणेश मंदिर का मुख्य पुजारी नियुक्त किया। टैब से लेकर आज तक, नीनी के वंशज पूरी निष्ठा से यहां की पूजा-व्यवस्था संभाल रहे हैं।
💫मारात की अनोखी परंपराएँ और सामाजिक रीति-रिवाज
रातानाडा गणेश मंदिर जोधपुर के स्थानीय समाज के ताने-बाने से गहराई तक डूबा हुआ है। यहां की कुछ त्रिशूल परंपराएं इस प्रकार हैं:
• शादी का पहला कार्ड (कुमकुम पत्र): जोधपुर और आसपास के क्षेत्र में यह अनिवार्य परंपरा है कि किसी भी घर में शादी का पहला कार्ड (न्योता) रातानाडा गणेश जी के चरण में मनाया जाता है। लोग गाजे-बाजे के साथ बप्पा को आमंत्रित करने आते हैं और शादी के बाद किस्मत आजमाने के बाद जोड़े के साथ ‘ढोक’ (आशीर्वाद) लेते हैं।
• समुदाय की पहली पूजा: शहर में जब भी कोई नया वाहन (कार, बाइक आदि) खरीदा जाता है, तो सबसे पहले रातानाडा पहाड़ी पर उसे भगवान के समरूप स्वास्तिक निर्माणकर पूजा में शामिल किया जाता है।
• पवित्र कुंड का गुप्त जल: मंदिर की पहाड़ी पर स्थित दो प्राचीन प्राकृतिक तालाबों में से एक को विशेष रूप से स्थापित किया गया है। इसके जल का उपयोग केवल भगवान के नित्य स्नान और अभिषेक के लिए होता है, जहां आम जनता का प्रवेश होता है।
• मंत के उल्टे स्वास्तिक: यहां आने वाले भक्त मंदिर की दीवारों पर मंत मांगते हुए तट स्वास्तिक तोड़ते हैं और इच्छा पूरी तरह से होने वाली संस्था सीधे स्वास्तिक से बप्पा का स्वागत करते हैं।
रविवार के दिन और वार्षिक गणेश चतुर्थी उत्सव के दौरान यहां का नजारा दिखता ही बनता है, जब लाखों की संख्या में हाथी ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारों के साथ 108 फीट की ऊंचाई पर इस पहाड़ी की सीढ़ियां दर्शन के लिए जाते हैं।
